Uttar Vaidik Kaal,‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌उत्तर वैदिक काल,GK Questions Answer, General Knowledge-atmword.com

‌Uttar Vaidik Kaal
‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌उत्तर वैदिक काल

उत्तर वैदिक काल (1000-600 ई.पू.)
* भारतीय इतिहास में उस काल को जिसमें सामवेद,यजुवेद एवं अथर्ववेद तथा ब्राह्मण
ग्रथो, आरण्यको एवं उपनिषद की रचना हुर्इ को उत्तर वैदिक काल कहा जाता है।
* उत्तर वैदिक कालीन सभ्यता का मुख्य केन्द्र मघ्यदेश था जिसका प्रसार सरस्वती से लेकर गंगा के दोआब तक था।
* मगध एवं अंग प्रदेश आर्य सभ्यता के क्षेत्र से बाहर थे।
* मगध में निवास करने वाले लोगों को अर्थर्ववेद में ब्रात्य कहा है ये प्रकृत भाषा बोलते थे।
* उत्तर वैदिक काल में पाचाल सर्वाधिक विकसित राज्य था।
* दक्षिण में आर्यो का फैलाव विदर्भ तक हुआ।
* परीक्षित को मृत्युलोक को देवता कहा गया है।
* कुरूवंश का इतिहास महाभारत युद्व (18 दिनों तक चलने वाला सभंवत: 950 ई.र्पू के आस-पास) के नाम से विख्यात है।
* उत्तर वैदिक काल में त्रिककुद,कैन्नज और तथा मैनाक (हिमालय क्षेत्र में स्थित) पर्वर्तो का उल्लेख मिलता है।
* प्रदेश का संकेत करने वाला शब्द राष्ट्र सर्वप्रथम उत्तर वैदिक काल में ही प्रयोग किया गया है।
* सर्वप्रथम ऐतरेय ब्राह्मण में ही राजा की उत्पति का सिंद्धात मिलता है।
* उत्तर वैदिक काल में राजा को बड़ी-बड़ी उपाधियां मिलने लगी थी जैसे अधिराज राजाधिराज,सम्राट,एकराट।
* राजा के राज्यभि षेक के समय राजसूय यज्ञ का अनुष्ठान किया जाता था।
* शतपथ ब्राह्मण में 12 प्रकार के रत्नियों का विवरण दिया गया है।
* 17 प्रकार के जल का प्रयोग राजा के राज्यभिषेक में होता था।
* उत्तर वैदिक काल में राजा का राज्याभिषेक पुरोहित द्धारा एक सौ छिद्र वाले सुवर्ण पात्र से किया जाता था।
* सर्वप्रथम करों की नियमित व्यवस्था का उल्लेख उत्तर वैदिक काल में ही मिलता है।
* भागधुक कर सग्रंह करने वाले अधिकारी होता था।
* संग्रहिता राजको ष के नियन्ता को कहा जाता था।
* शतपथ ब्राह्मण में उल्लिखित शब्द बलीकृत सें सकेत मिलता है कि इस काल मे कर का बोझ वैश्य वर्ग के लोग ही वहन करते थे।
* कर की अदायगी अन्न एवं पशु दोनो के रूप् में की जाती थी।
* अक्षवाद आय-व्यय का लेखा जोखा रखने वाला अधिकारी होता था।
* गोविकर्त्ता जंगल विभाग का मुख्य अधिकारी होता था।
Bhakti and Sufi Movement
Bharat Ke Parmukh Aitihasik Yuddh Chalukya Dynasty
* पालागल राजकीय आदेशों एवं सदेशों को पहॅुचाने का कार्य करता था।
* उत्तर वैदिक सभा में औरतो का प्रवेश वर्जित था।
* उत्तर वैदिक काल तक समाज स्पष्ट रूप से चार वर्गो में विभाजित हो चुका था। ये चार वर्ग थे-ब्राह्मण,क्षत्रिय, वैश्य, शुद्ध ।
* उत्तर वैदिक काल मे यज्ञोपवीत सस्कांर का अधिकार शूद्धो को नही था।
* ग्रह निर्माण कच्ची और पक्की ईटों,मिट्टी बॉस एवं लकड़ी से किया जाता था।
* कुल का उल्लेख सबसे पहले उत्तर वैदिक में मिलता है।
* ऐतरेय ब्राह्मण में सव्रप्रथम चारों वर्णो के कर्मो के विषय में विवरण मिलता है।
* शतपथ ब्राह्मण में शुद्धो के सोमयज्ञ में भाग लेने की बात कही गयी है।
* उत्तर वैदिक काल में शुद्धो के अन्य वर्ग थे-चांडाल, निषाद् पौल्कस,मागध,उग्र वेदहव,आवोगन आदि।
* शतपथ ब्राह्मण एवं काठक संहिता में गोपिकर्तन,तक्ष (बढई) एवं रथकार (रथ बनाने वाले) को भी रत्नियो की श्रेणी में रखा गया ।
* उत्तर वैदिक में उपजाति के रूप में व्यापारी,लोहार,रथ निर्माता बढई,चमार,कर्मकार,मल्लाह का उल्लेख मिलता है।
* उत्तर वैदिक काल में जाति परिवर्त्तन करना कठिन हो गया था।
* उत्तर वैदिक काल में चारो आश्रमों का स्पष्ट जिक्र नही मिलता है।
* सर्वप्रथम जावालोपनि षद् में चारो आश्रमों का विवरण मिलता है। ये चार आश्रम थे- ब्रहाचर्य,ग्रहस्थ,वानप्रस्थ और सन्यास।
* उत्तर वैदिक काल में ब्रहाचर्य,ग्रहस्थ,वानप्रस्थ का ही उल्लेख किया गया है।
* उत्तर वैदिक काल में अन्तर्वणीय विवाह,बहुविवाह,विधवा विवाह,नियोग प्रथा,दहेज प्रथा का प्रचलन था।
* बाल विवाह,पर्दा प्रथा,सती प्रथा का उल्लेख उत्तर वैदिक काल में नही मिलता है।
* अथर्ववेद कन्याओं के जन्म की निन्दा करता है।
* मैत्रीयणी संहिता में स्त्री को छूत और मदिरा की श्रेणी मे रखा गया है।
* ऐतरेय ब्राह्मण में पुत्री को सभी दुखो का स्रोत तथा पुत्र को परिवार का रक्षक बताया गया है।
* ऐतरेय ब्राह्मण में बेटी को कृपण कहा गया है।
* उत्तर वैदिक काल में औरतो का सभा मे प्रवेश में रोक था।
* कृशि इस समय में आर्यो का प्रमुख व्यवसाय था।
* अथर्ववेद के विवरण के आधार पर सबसे पहले पृथवैन्य ने हल एवं कृषि को जन्म दिया।
* सर्वप्रथम शतपथ ब्राह्मण में कृषि की समस्त प्रक्रियाओं कर्षण(जुताई) बपन(बुआई)
लुनन(कटाई) एवं मर्षन(मड़ाई) को उल्लेख मिलता है।
* काठक संहिता में 24 बैलो द्धारा हल खीचने का वर्णन है।
* दो तरह के धान ब्रीहि एवं तण्डुल तथा ईक्षु (ईख) का उल्लेख अर्थववेद में मिलता है।
* अर्थववेद में ही सिचार्इ के साधन के रूप में कूप एवं नहर का उल्लेख किया गया है।
* तैतिरीय उपनिशद् में अन्न को ब्रह्म कहा गया है।
* यजुर्वेद में हल को सीर कहा गया है।
* उत्तर वैदिक में महत्वपूर्ण पशु के रूप में गाय का पाला जाता है।
* बडे़ बैल का उत्तर वैदिक काल में महोक्ष कहा जाता था।
* उत्तर वैदिक काल में ऊर्ण(ऊन) शण (सन्)।
* शतपथ ब्राह्मण में कौश (रेशम) एवं मैत्रायणी संहिता में क्षोभ का उल्लेख मिलता है।
* यजुर्वेद में हिरण्य (सोना) त्रपु (टिन) सीसा,अयस एवं लौहा का विवरण मिलता है।
* चॉदी का उल्लेख अथर्ववेद में मिलता है।
* उत्तर वैदिक काल में लोहे का श्याम अयस एवं कृष्ण अयस कहा गया है।
* भारत में लोहे के प्रयोग के साक्ष्य करीव 800 ई.पू में पश्चिम उत्तर प्रदेश में तीरो के फलक एवं भालो के फलक के रूप में मिलते है जो लौहे से निर्मित थे।
* उत्तर वैदिक काल में कर्भार शब्द लुहार के लिए प्रयुक्त हुआ है।
* अथर्ववेद में तक्षा शब्द का उल्लेख बढर्इ के लिए हुआ है।
* यजुवेर्द में कैवत शब्द मछुआरे के लिए आया है। कुलाल शब्द कुम्भकार के लिए आया है।
* ऋग्वैदिक 7 पुरोहितो की जगह उत्तर वैदिक काल में 14 पुरोहितों का उल्लेख मिलता है।
* उत्तर वैदिक काल में ऋग्वैदिक काल के महत्वपूर्ण देवता इन्द्र,अग्नि एवं वरूण महत्वहीन हो गये।
* उत्तर वैदिक काल में सर्वश्रेष्ठ देवता के रूप में उभरने वाले प्रतापति (सुष्टि के निर्मात्ता) थे।
* रूद्ध जिन्हें ऋग्वैदिक काल में पशुओं का देवता माना जाता था। इनकी पुजा उत्तर वैदिक काल में शिव के रूप में होने लगी।
* उत्तर वैदिक काल में विश्णु को सर्व सरंक्षक के रूप में पुजा जाता था।
* पुषन शुद्धो के देवता के रूप में प्रचलित थे।

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