swami vivekanand,Current Affairs,GK Questions Answer, General Knowledge-atmword.com

स्वामी विवेकानंद
‌‌‌‌Swami Vivekanand

स्वामी विवेकानन्द (आध्यात्मिक गुरु)
जन्म की तारीख ‌और स्थान :-12-जनवरी-1863, कोलकाता बेलूर, पश्चिम बंगाल, भारत
मृत्यु की तारीख ‌और स्थान :- 04-जुलाई-1902, बेलुर मठ, हावड़ा बेलूर, पश्चिम बंगाल, भारत
पिता का नाम:-विश्वनाथ दत
माता का नाम:- भुवनेश्वरी देवी
राष्ट्रीयता:-भारतीय
धर्म :-हिंदू
स्वामी विवेकानन्द के 9 भाई बहन थे।
स्वामी विवेकानंद को घर में सभी नरेंद्र के नाम से पुकारते थे।
स्वामी विवेकानंद पूरा नाम नरेंद्र नाथ विश्वनाथ दत था ।
स्वामी विवेकानंद 1871 में जब 8 वर्ष के थे, उनका प्रवेश ईश्वर चन्द्र विद्यासागर के मेट्रोपोलिटन इंस्टिट्यूशन में करा दिया गया।
स्वामी विवेकानंद 1877 – 1879 तक वे सह परिवार रायपुर में रहे थे।
स्वामी विवेकानंद 1879 में पुनः कलकत्ता लौट आये।
स्वामी विवेकानंद 1879 में नरेन्द्र ने अपनी मेट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
स्वामी विवेकानंद कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया।
स्वामी विवेकानंद 1884 में बेचलर ऑफ़ आर्ट की डिग्री प्राप्त कर ली थी।
स्वामी विवेकानन्द के पिता विश्वनाथ दत्त कलकत्ता उच्च न्यायलय में अभिवक्ता थे।
स्वामी विवेकानन्द के माता भुवनेश्वरी देवी एक धार्मिक घरेलु महिला थी।
स्वामी विवेकानन्द वेदान्त के विख्यात और प्रभावशाली आध्यात्मिक गुरु थे।
स्वामी विवेकानन्द गरीबों की सेवा के लिए “रामकृष्ण मिशन” की स्थापना की।
स्वामी विवेकानन्द 1881 में वे दक्षिणेश्वर के रामकृष्ण परमहंस से मिले।
स्वामी विवेकानन्द ने यूरोपीय इतिहास का अध्ययन जेनेरल असेंबली इंस्टीट्यूट में किया था।
30 वर्ष की उम्र में स्वामी विवेकानंद जी ने अमेरिका के विश्व धर्म सम्मेलन में हिन्दू धर्म का प्रतिनिधित्व किया।
गुरुदेव रवींद्र नाथ जी का कहना था कि आप भारत को जानना चाहते हैं तो विवेकानंद जी को पढ़िए मैं आप सब कुछ सकारात्मक ही पाएंगे नकारात्मक भी नहीं।
लोगों को सांस्कृतिक भावनाओं के जरिए जोड़ने की कोशिश की।
जातिवाद से जुड़ी कुरीतियों को मिटाने की कोशिश की और नीची जातियों के महत्व को समझाया और उन्हें समाज के मुख्यधारा से जोड़ने का काम किया।
स्वामी विवेकानंद जी ने भारतीय धार्मिक रचनाओं का सही अर्थ समझाने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
स्वामी विवेकानंद जी ने दुनिया के सामने हिंदुत्व के महत्व को समझाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया।
Rabindranath Tagore Swami Vivekanand Dr Rajendra Prasad ‌‌‌Subhash Chandra Bose
विवेकानंद जी ने धार्मिक परंपराओं पर नई सोच का समन्वय स्थापित किया।
स्वामी विवेकानंद जी जन्म दिवस को “राष्ट्रीय युवा दिवस” के रूप में मनाया जाता हैं।
स्वामी विवेकानंद के पास पैसे नहीं थे लेकिन अमेरिका जाने के लिए उनके अमेरिका की यात्रा का पूरा खर्च राजपूताना के खेतड़ी नरेश द्वारा उठाया गया. उन्होंने ही स्वामी जी को नरेंद्रनाथ दत्त से स्वामी विवेकानंद का नाम भी दिया।
‌‌‌‌स्वामी विवेकानंद अनमोल वचन
जब तक तुम अपने आप में विश्वास नहीं करोगे, तब तक भगवान में विश्वास नहीं कर सकते.
हम जो भी हैं हमारी सोच हमें बनाती हैं इसलिए सावधानी से सोचे, शब्द द्वितीय हैं पर सोच रहती हैं और दूर तक यात्रा करती हैं.
हम जितना बाहर आते हैं और जितना दूसरों का भला करते हैं, हमारा दिल उतना ही शुध्द होता हैं और उसमे उतना ही भगवान का निवास होगा.
जब एक सोच दिमाग में आती हैं तो वह मानसिक और शारीरिक स्थिति में तब्दील हो जाती हैं. 
संसार एक बहुत बड़ी व्यायामशाला हैं जहाँ हम खुद को शक्तिशाली बनाने आते हैं.
सच हजारो तरीके से कहा जा सकता हैं तब भी उसका हर एक रूप सच ही हैं.
ऐसा कभी नहीं सोचना चाहिए कि आत्मा के लिए कुछ भी असम्भव हैं. यह सोचना ही सबसे गलत हैं. अगर यह पाप हैं तो वही पाप हैं कि हम खुद को और दूसरों को कमजोर कह रहे हैं.
ब्राह्मण की सारी शक्तियाँ हमारी हैं यह हम ही हैं जो अपनी आँखों के आगे हाथ रख लेते हैं और रोते हैं कि अंधकार हैं.
जिस वक्त मुझे यह महसूस हुआ कि भगवान शरीर रूपी मंदिर में रहते हैं, उस पल से मैं हर एक व्यक्ति के सामने खड़े हो कर उनकी पूजा करता हूँ उस पल से मैं सारी बंधिशों से मुक्त हो गई. सभी चीजे जो बांधती हैं वो खत्म हो गई और मैं स्वतंत्र हो गया.
भगवान को अपने प्रिय की तरह पूजा जाना चाहिए, यह पूजा आज के और अगले जीवन से बढ़कर होनी चाहिए.
बाहरी स्वभाव आतंरिक स्वभाव का बड़ा रूप हैं.
जैसे अलग-अलग धाराएँ अलग-अलग जगह से आती हैं पर सभी एक सागर में मिल जाती हैं, उसी तरह भिन्न- भिन्न विचारों के लोग भले सही हो या गलत सभी भगवान के पास जाते हैं.
‌‌‌‌स्वामी विवेकानन्द के शिक्षा दर्शन के आधारभूत सिद्धान्त निम्नलिखित हैं:
शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक का शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक विकास हो सके।
शिक्षा ऐसी हो जिससे बालक के चरित्र का निर्माण हो, मन का विकास हो, बुद्धि विकसित हो तथा बालक आत्मनिर्भन बने।
बालक एवं बालिकाओं दोनों को समान शिक्षा देनी चाहिए।
शिक्षा, गुरू गृह में प्राप्त की जा सकती है।
धार्मिक शिक्षा, पुस्तकों द्वारा न देकर आचरण एवं संस्कारों द्वारा देनी चाहिए।
मानवीय एवं राष्ट्रीय शिक्षा परिवार से ही शुरू करनी चाहिए।
पाठ्यक्रम में लौकिक एवं पारलौकिक दोनों प्रकार के विषयों को स्थान देना चाहिए।
देश की आर्थिक प्रगति के लिए तकनीकी शिक्षा की व्यवस्था की जाय।
सर्वसाधारण में शिक्षा का प्रचार एवं प्रसार किया जान चाहिये।
शिक्षक एवं छात्र का सम्बन्ध अधिक से अधिक निकट का होना चाहिए।