| ★ महाबलीपुरम नरसिंहवर्मन प्रथम के राज्य का प्रमुख बदरगाह था। |
| ★ नरसिंह वर्मन प्रथम ने महामल्लपुरम नामक नगर बसाया। |
| ★ नरसिंह वर्मन प्रथम के शासन काल में चीनी चात्री हेनसांग कांची गया था। |
| ★ नरसिंह वर्मन प्रथम के मृत्यु के बाद उसका पुत्र महेन्द्रवर्मन द्धितीय शासक बना। |
| ★ महेन्द्रवर्मन द्धितीय के बाद परमेश्वरवर्मन प्रथम शासक बना। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम के राजमुकुट का एक बहुमूल्य रत्न वह हार जिसमें उग्रेदय नामक मणि लगी थी शत्रु को सौपनी पड़ी। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम शैव मत में विश्वास रखता था। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम एकमल्ल,रणजय,अनंतकाम,उग्रदंड़,गुणभाजन आदि उपाधियॉ धारण की थी। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम ने अनेक शिव मदिरों का तथा मामल्लपुरम् में गणेष मंदिर का निर्माण करवाया था। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम ने विधाविनीत की भी उपाधि धारण की थी। |
| ★ परमेश्वर वर्मन प्रथम की मृत्यु के बाद उसका पुत्र नरसिंह वर्मन द्धितीय उत्तराधिकारी हुआ। |
| ★ नरसिंह वर्मन द्धितीय ने कांची के कैलाशनाथ मंदिर तथा महाबलीपुरम् कि शोर मंदिर का निर्माण करवाया था। |
| ★ अलंकारशास्त्र का महान् पंडित दण्डी सभवत: नरसिंहवर्मन के दरबार में अनेक वर्षो तक रहा। |
| ★ नरसिंह वर्मन द्धितीय ने अपने राजदूत को चीन भेजा। |
| ★ नरसिंह वर्मन द्धितीय ने चीनी बौद्ध यात्रियों के लिए नागपट्टम में एक बिहार निर्माण करवाया था। |
| ★ नरसिंह वर्मन द्धितीय के बाद परमेश्वर वर्मन द्धितीय शासक बना। |
| ★ विल्लद नामक स्थान पर गंग राजा ने परमेश्वर वर्मन द्धितीय को मार डाला तथा पर्मानाड़ी की उपाधि के साथ-साथ पल्लव राजच्छत्र पर भी अधिकार कर लिया। |
| ★ राजधानी के अधिकारियो ने धटिका (पंडित, ब्राहृाण वर्ग) तथा जनता की सहमति से पल्लव राजवंश की एक दूसरी शाखा से हिरण्यवर्मन के पुत्र नंदिवर्मन द्धितीय को अपना राजा चुना। |
★ नंदिवर्मन द्धितीय का राष्ट्रकूट शासक दन्तिदुर्ग से युद्ध हुआ लेकिन कालान्तर में दोनों में संधि हो गर्इ और वैवाहिक सबंध भी स्थापित हुए उसका विवाह राष्ट्रकूट कूट शासक की पुत्री रेखा के साथ हुआ। |
| ★ नंदिवर्मन द्धितीय वैष्णव मतानुयायी था। |
| ★ नंदिवर्मन द्धितीय ने कॉची के मुक्तेश्वर मंदिर तथा बैकुठ पेरूमल मंदिर का निर्माण करवाया था। |
| ★ प्रसिद्ध वैष्णव सतं तिरूमंगर्इ अलवार उसके समकालीन थे। |
| ★ नंदिवर्मन द्धितीय के बाद उसका पुत्र दंतिवर्मन सिंहासन पर बैठा। |
| ★ दंतिवर्मन ने मद्रास के पास त्रिप्लीकेन में पार्थ सारथि मंदिर का पुन निर्माण करवाया था। |
| ★ दंतिवर्मन भी वैष्णव धर्म में विश्वास रखता था। एक अभिलेख में उसे विष्णु का अवतार कहा गया है। |
| ★ दंतिवर्मन के बाद उसका पुत्र नदिवर्मन तृतीय शासक बना। उसने अपने वंश की खोई प्रतिष्ठा को पुन: प्राप्त करने का प्रयास किया। |
| ★ नंदिवर्मन तृतीय ने पाण्ड्यो की सेना को कई युद्धो मे परास्त कर कवेरी द्धारा सिचित प्रदेश का स्वामी बना। गंग शासको ने भी उसकी अधीनता स्वीकार की। |
| ★ उसने राष्ट्रकूट नरेश अमोधवर्ष की कन्या शंखा के साथ उसका विवाह हुआ। |
| ★ नंदिवर्मन तृतीय शैव मतानुयायी था। उसकी राजसभा मे तमिल भाषा के प्रसिद्ध कविसंत पेरून्देवनार निवास करता था जिसने भारतवेणवा नामक ग्रंथ की रचना की। |
| ★ नंदिवर्मण तृतीय के बाद उसका पुत्र नृपतुगवर्मन राजा हुआ। |
| ★ नृपतुगवर्मन की माता राष्ट्रकूट राजकुमारी थी। |
| ★ संभवत: नृपतुगवर्मन ने अरचित नदी के तट पर पाण्ड्यो का हराया। |
| ★ नृपतुगवर्मन उदार तथा विधा प्रेमी शासक था उसे वेद वेदाग,मीमासा,न्याय,पुराण तथा धर्मशास्त्रों के अध्ययन की समुचित व्यवस्था करवाई। |
| ★ पल्लव वंश का अतिम महत्वपूण शासक अपराजित था। उसने चोल नरेश आदित्य प्रथम की सहायता प्राप्त कर पाण्ड्य वंशी शासक श्रीदूरम्बिमम् के युद्ध में परास्त किया। बाद मे उसके मित्र चोल नरेश आदित्य प्रथम ने उसकी हत्या कर दी। |
| ★ पल्लव के समय में ही नयनारों तथा अलवारों के भक्ति आदोलन हुए। |
| ★ शैवधर्म का प्रचार नयनार सतों द्धारा किया गया जिसकी सख्या 63 बतायी गई है। |